नवरात्र में देवी के दस महाविद्या स्वरुप की अराधना आपके जन्म कुण्डली के हानिकारक ग्रहों के प्रभाव को कर देते हैं आपके अनुकूल ; प्रथम दिन होती है मां शैलपुत्री की पूजा

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SARAN DESK –   नवरात्र में देवी के दस महाविद्या स्वरुप की अराधना आपके जन्म कुण्डली के हानिकारक ग्रहों के प्रभाव को आपके अनुकूल कर देते हैं. आइए जानते हैं प्रसिद्ध ज्योतिषाचार्य डाॅ सुभाष पाण्डेय से कि कैसे और किस देवी की अराधना करने से कौन ग्रह देने लगता है शुभ फल. कैसे खुल जाते हैं भाग्य के बन्द दरवाजे. जब ईश्वर में आस्था हैं तो उलझनों में भी रास्ता है. ज्योतिष शास्त्र एक विज्ञान हैं, वह विज्ञान जो समाज में रोशनी फैलाता हैं. इसे science of light कहा जाता हैं. जीवन का दो अहम पहलु हैं – कर्म और धर्म. मनुष्य को कभी कर्म करना छोडना नहीं चाहिए एवं अपने धर्म के पथ से विच्युत नहीं होना चाहिए.

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हर मनुष्य का भाग्य इन दो अहम पहलुओं पर निर्भर करता है.
शास्त्रों के अनुसार माता सती की दस स्वरूपों को दस महाविद्या कहा गया हैं.  दस महाविद्या में से किसी एक की नित्य पूजा अर्चना करने से लंबे समय से चली आ रही बिमारियां, कलह, क्लेश, बेरोजगारी समस्या, शनि की साढे साती, ढैया, प्रेत बाधा, बुरी नजर, जीवन में सफलता न पा पाना आदि सभी तरह के संकट तत्काल ही समाप्त हो जाते हैं. इन माताओं की साधना से मनुष्य को अपार शक्ति और सिद्धियां मिलती हैं.

दस महाविद्या की उत्पत्ति

दस महाविद्या की उत्पत्ति की कथा “महा भागवत” में उपलब्ध हैं. जिससे यह स्पष्ट होता हैं की माता सती के ही यह दस स्वरूप हैं. माता सती के पिता दक्ष प्रजापति शिवजी के विरोधी थे और उन्हें अपमानित करने के लिए एक यज्ञ का आयोजन किया, जहां शिव सती को छोड कर बाकी सारे देव, ऋषि, मुनि, गन्धर्व को आमन्त्रित किया. आमन्त्रण नहीं होने के बावजूद भी माता सती यज्ञ में जाने के लिए भोलेनाथ से अनुमति मांगी. जब आशुतोष ने इनकार कर दिया तब माता हठ करने लगी और आवेश में आकर कहा – “मैं अपने पिता के यज्ञ में जाऊंगी और वहां या तो अपने पति के लिए यज्ञ भाग लाऊंगी या फिर यज्ञ को नष्ट कर दूंगी.”
यह कहते हुए माता की दोनों नेत्र रक्त वर्ण हो गए, होंठ फडकने लगे, रंग श्याम हो गया, उनके केश बिखर गये, लाल जिह्वा बाहर निकली हुई थी, क्रोधाग्नि में माता की शरीर महाविकराल दिखाई देने लगा. माता  सती के इस रूप को देख कर महाकाल भयभीत होकर वहां से भागने लगे. परन्तु माता की दस स्वरूप उन्हें दस दिशायों से घिर लिया. महादेव ने उन्हें परिचय पुछने पर माता सती ने कहा की यह उन्हीं की ही रूप हैं.

दस महाविद्या का नाम

1. काली
2. तारा
3. त्रिपुरा सुन्दरी
4. भुवनेशवरी
5. भैरवी
6. छिन्नमस्ता
7. धूमावती
8. बगलामुखी
9. मातंगी
10. कमला
अनेक रूप और उपासना विधि में भेद होते हुए भी फलतः ये एक ही हैं. इनकी साधना से दुर्लभ सिद्धियां प्राप्त होती हैं.

दस महाविद्या की साधना से करें ग्रहों को शांत

ज्योतिष शास्त्र में दस महाविद्याओं का बहुत महत्व हैं. हर ग्रह का सम्बन्ध किसी एक महाविद्या से हैं. इसलिए जो ग्रह पीडा दे रहा हैं ग्रह सम्बन्धी महाविद्या की आराधना करने से उस ग्रह सम्वन्धी बाधाएं दूर होते हैं. चलिए जानते हैं कौन से ग्रह के लिए कौन सी महाविद्या का आराधना करना चाहिए , जिससे हम उस ग्रह को शुभ कर सकें

🔯 सूर्य ग्रह के लिए :- मां मातंगी
🔯 चन्द्रमा के लिए :-  मां भुवनेश्वरी
🔯 मंगल के लिए   :-  मां बगलामुखी
🔯 बुध के लिए      :-  मां त्रिपुरा सुन्दरी
🔯 बृहस्पति के लिए :- तारा मां
🔯 शुक्र के लिए        :- कमला माता
🔯 शनि के लिए        :- मां काली
🔯 राहु के लिए         :- मां छिन्नमस्तिका
🔯 केतु के लिए       :- मां धूमावती
अगर आपका लग्न कमजोर हैं या उस पर कोई  दुष्प्रभाव हैं तो माता त्रिपुरा भैरवी जी की आराधना करने पर आपका लग्न मजबूत होगा. अत: अपने ग्रह अनुसार दस महाविद्या का पूजा करने पर आपको हर तरह से शुभता प्राप्ति होगी.

नवरात्र का प्रथम दिन मां शैलपुत्री की आराधना ; चंद्रमा के बुरे प्रभाव हो जाते हैं निष्क्रिय

नवरात्रि के नौ दिन मां दुर्गा के अलग-अलग स्वरूपों की पूजा-अर्चना की जाती है. पहले दिन कलश स्थापना कर मां दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की पूजा-अर्चना की जाती है. मां शैलपुत्री हिमालय राज की पुत्री है. पर्वत राज हिमालय के यहां जन्म लेने के कारण यह देवी शैलपुत्री के नाम से विख्यात हुई. धार्मिक मान्यता है की मां शैलपुत्री को शैल के सामान यानि सफेद वस्तु प्रिय है. इसलिए उनको सफेद वस्त्र के साथ भोग में भी सफेद मिष्ठान और घी अर्पित किए जाते हैं. साथ ही इस दिन सफेद वस्त्र भी धारण किया जाता है.

मां शैलपुत्री की सवारी वृषभ है. उनके दाहिने हाथ में त्रिशूल और बाएं हाथ में कमल का पुष्प होता है. शास्त्रों के अनुसार मां शैलपुत्री चंद्रमा को दर्शाती है. कहा जाता है की माता रानी के शैलपुत्री स्वरूप की उपासना से चंद्रमा के बुरे प्रभाव निष्क्रिय हो जाते हैं. उनकी पूजा करने से व्यक्ति को सुख समृद्धि की प्राप्ति होती है. साथ ही कुंवारी कन्याओं को सुयोग्य वर की प्राप्ति होती है.

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