मकर संक्रांति उत्सव को ले पतंग व तिलकुट का बाजार गुलजार ; शीतलहर के बाद भी पतंगबाजों का दिखा जुनून, पर बदल गई हमारी परंपरा

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CHHAPRA DESK – मकर संक्रांति उत्सव को ले पतंग एवं तिलकुट-तिलवा का बाजार पूरी तरह सजा हुआ है. ऐसे में कुहासा व शीतलहर के प्रकोप के बाद भी पतंगबाजों का जुनून देखते बन रहा है. वहीं शहर में पतंग-मांझा और लटाई का बाजार पूरी तरह गुलजार है‌. सुबह से ही पतंगबाज बाजारों में पतंग-मांझा और लटाई की खरीदारी में लगे हैं. क्या छोटा बच्चा, जवान और बूढ़े सभी पतंग और मांझा खरीदते हुए नजर आ रहे हैं. वही मकर संक्रांति को ले एक महीने से तिलवा-तिलकुट की तैयारी में लगे व्यवसायी भी सुबह से ही अपनी दुकान सजाए बैठे हैं. वही काफी संख्या में लोग बाजारों में तिलवा-तिलकुट की खरीदारी में भी लगे हुए हैं.

लद गए मांझा बनाने और घर में तिलवा बनाने की परंपरा

मकर संक्रांति उत्सव भी अब नये स्वरूप में आ चुका है. कल तक जहां कॉटन धागा का मांझा बनाने और रंगीन पेपर का पतंग उड़ाने की परंपरा थी आज अब पुरानी बातें हो चुकी है. क्योंकि कल तक मांझा बनाने के लिए दर्जनभर दोस्तों की जरूरत होती थी. मांझा बनाने के लिए आग पर लेप का पकाना, बल्ब और ट्यूब के टुकड़े इकट्ठे कर उसे कूटकर बारीक करना, गोंद लगाना आदि के लिए टीम बनता था. जिससे आपसी सौहार्द भी बढ़ता था. आज वह सब कुछ समाप्त हो चुका है.

अब तो कॉटन धागे के मांझा का स्थान प्लास्टिक धागे ने ले लिया है. वही पेपर के पतंग का स्थान प्लास्टिक के पतंग ने ले लिया है. और तो और तिलवा-तिलकुट के लिए घोसार में नंबर लगाकर चुड़ा और चावल का भुंजवाना फिर घर में गुड़ का पाग कर तिलवा बनाते समर गीत गाने की परंपरा भी समाप्त हो चुकी है. अब तो लोग अपनी पुरानी परंपराओं को झंझट समझते हुए सीधे बाजार से रेडीमेड सामान खरीद कर पर्व-त्यौहार मनाने लगे हैं. ऐसे में ऐसे में इन त्योहारों में आपसी सौहार्द की मिठास कहां से आएगी.

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