ईद विशेष : क्या है ईद का इतिहास ? क्यों मनाया जाता है ईद ?

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CHHAPRA DESK – मुसलमानों के दो ईद में से एक ईद उल अज़हा जिसे बकरीद या क़ुरबानीके नाम से जानते हैं. पहले ईद ईद अल-फ़ितर मीठी ईद के नाम से जानते हैं. इस्लाम में दोनों ईद सबसे महत्वपूर्ण त्यौहार है. ईद उल -फ़ितर जो रमज़ान के पवित्र महीने के अंत का प्रतीक है. रमजान के महीने में जहां मुसलमान सुबह से शाम तक रोज़ा रखते हैं, पवित्र कुरान का पाठ करते हैं और अल्लाह से दुआ (प्रार्थना) करते हैं. वही ईद उल-अज़हा जिसे बकरा ईद, बकरीद, ईद क़ुर्बान या क़ुरबानी इब्राहीमी के नाम से भी जाना जाता है.

दुनिया भर के मुसलमानों द्वारा मनाया जाने वाला दूसरा प्रमुख इस्लामी त्यौहार है और यह पैगंबर इब्राहिम अलैहिस सलाम अल्लाह के प्रति पूर्ण समर्पण की याद दिलाता है. बकरीद दुनिया भर के मुसलमानों द्वारा जुल हिज्जा (इसमलमी साल का बारहवाँ महीना) में मनाई जाती है. हज भी इसी महीने में किया जाता जाता हैं. शारीरिक और आर्थिक रूप से संपन्न हर मुसलमान को अपनी जिंदगी में कम से कम एक बार हज करना फ़र्ज़ हैं. हज इस्लाम के पांच स्तंभों में से एक है. इस महीने के दसवें दिन ईद उल अज़हा मनाई जाती है.

ईद-उल-अज़हा की तारीख अलग-अलग देशों में अलग-अलग होती है. यह इस बात पर निर्भर करता है कि महीने की शुरुआत को चिह्नित करने के लिए चांद कब देखा जाता है. भारत में 07 जून को चांद देखा गया था जिस के अनुसार क़ुरबानी का त्यौहार 17 जून के मनाई जा रही है. जबकि सऊदी अरब और दूसरे कड़ी के देशों में 06 जून को दिखाई दिया जिस के अनुसार 16 जून रविवार को क़ुरबानी मनाई गई.

क्या है इतिहास

ईद-उल-अज़हा का इतिहास तब से शुरू होता है जब पैगंबर इब्राहिम अलैहिस सलाम को अपने प्यारे बेटे, इस्माइल को अल्लाह की रजामंदी और क़ुरब (इच्छा) हासिल करने के लिए बेटे को कुर्बान करने का का बार-बार सपना आता था. इब्राहिम ने अपने बेटे से इस सपने के बारे में बात की. बात सुननसुनने के बाद इस्माइल अलैहिस सलाम ने कहा कि अल्लाह की मर्जी के मुताबिक खुद को कुर्बान करने के तैयार हैं आप तयारी करें और मुझे उस पर खड़ा पाएंगे. अपने पिता से सहमत था और उसे अल्लाह की इच्छा का पालन करने के लिए कहा. शैतान ने इब्राहिम अ० स० को बहकाते हुए क़ुरबानी देने से रोकने की कोशिश की.

अल्लाह ने इब्राहिम की अगाध भक्ति देखी और देवदूत जिब्रील अ० स० को बलि के लिए एक भेड़ लेकर भेजा. जिब्रील ने इब्राहिम से कहा कि ईश्वर उसकी भक्ति से प्रसन्न है और उसने अपने बेटे की जगह भेड़ को बलि के लिए भेज दिया. तब से मवेशियों की क़ुरबानी ईद-उल-अज़हा का एक प्रमुख हिस्सा है जो न केवल पैगंबर इब्राहिम और इस्माइल के अल्लाह के प्रति प्रेम की याद दिलाता है बल्कि यह भी दर्शाता है कि कोई व्यक्ति अल्लाह की खातिर अपनी सबसे प्रिय चीज़ का बलिदान देने के लिए तैयार है.

जैसा की कुरआन में बताया गया है कि क़ुरबानी की गोश्त को तीन बर्बर हिस्सों के बांटा जाता जाता हैं. जिसमें एक हिस्सा परिवार को खिलाता है, दूसरा रिश्तेदारों को खिलाता है और तीसरा गरीबों और ज़रूरतमंदों को जाता है. ऐसा माना जाता है कि भले ही न तो मांस और न ही खून अल्लाह तक पहुंचता है, लेकिन उसके बंदों की भक्ति अल्लाह तक पहुंचती है.ईद उल अजहा के दिन सबसे पहले नमाज़ अदा की जाती हैं इसके के बाद घरों में जानवरों की क़ुरबानी की जाती हैं. नमाज़ के बाद इमाम द्वारा खुतबा दिया जाता है. जिसके बाद मुसलमान भाई एक दूसरे को मुबारक बाद पेश करते हैं.

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