जयंती पर याद किए गए शास्त्र और शस्त्र के आराध्य भगवान परशुराम

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CHHAPRA DESK – युवा ब्राह्मण चेतना मंच, सारण के तत्वावधान में भगवान परशुराम जयन्ती के पावन अवसर पर शहर में भव्य शोभा यात्रा निकाली गई. भगवान परशुराम की दिव्य झांकी का पूजन वैदिक मंत्रों के सस्वर पाठ के मध्य भाजपा के प्रदेश उपाध्यक्ष सह पूर्व विधायक मिथिलेश तिवारी, नेत्र चिकित्सक डा एस के पाण्डेय ने किया. जय परशुराम के उद्घोष के साथ शहर के विभिन्न मार्गों से गुजरती हुई शोभा यात्रा गुदरी बाजार के समीप स्थित शाह बनवारी लाल सरोवर परिसर पहुंची. जहां विप्र समागम का आयोजन हुआ.

सभा संचालन कार्यक्रम प्रभारी पंडित विमलेश तिवारी ने किया. अध्यक्षता पंडित शशिप्रकाश मिश्र मनोज ने किया. सभा को संबोधित करते हुए राष्ट्रीय संयोजक डाॅ सुभाष पाण्डेय ने कहा कि भृगुकुल शिरोमणि परशुरामजी ओज और तेज दोनों का अद्भुत संगम माने जाते हैं. क्योंकि, परशुराम का समूचा जीवन अनुपम प्रेरणाओं व उपलब्धियों से भरा हुआ है. वे न सिर्फ ब्रह्मास्त्र समेत विभिन्न दिव्यास्त्रों के संचालन में पारंगत थे, अपितु योग, वेद और नीति तथा तंत्र कर्म में भी निष्णात थे.

इन्हें श्रेष्ठ मानवीय मूल्यों का प्रतिष्ठाता माना गया है. उनकी मान्यता थी कि राजा का धर्म वैदिक जीवन का प्रसार करना है न कि अपनी प्रजा से आज्ञा पालन करवाना. अन्याय के विरुद्ध आवेशपूर्ण आक्रामकता के विशिष्ट गुण के कारण उन्हें भगवान विष्णु के ‘आवेशावतार’ की संज्ञा दी गयी है. दुनिया भर में शस्त्रविद्या के महान गुरु के नाम से विख्यात भगवान परशुराम ने महाभारत युग में भी अपने ज्ञान से कई महारथियों को शस्त्र विद्या प्रदान की थी.

उन्होंने भीष्म पितामाह, द्रोणाचार्य व कर्ण को भी विद्या देकर एक महान योद्धा बनाया था. शस्त्र विद्या के इस महारथी को केरल की मार्शल आर्ट कलरीपायट्टु की उत्तरी शैली ‘वदक्कन कलरी’ का संस्थापक आचार्य एवं आदि गुरु माना जाता है. वदक्कन कलरी अस्त्र-शस्त्रों की प्रमुखता वाली शैली है. जिस प्रकार देवनदी गंगा को धरती पर लाने का श्रेय राजा भगीरथ को जाता है ठीक उसी प्रकार पहले ब्रह्मकुंड (परशुराम कुंड) से और फिर लौहकुंड (प्रभु कुठार) पर हिमालय को काटकर ब्रह्मपुत्र जैसे उग्र महानद को धरती पर लाने का श्रेय परशुराम जी को ही जाता है.

इसी तरह अपने पिता जमदग्नि की आज्ञा से वे गंगा की सहयोगी नदी रामगंगा को धरती पर लाये थे. पौराणिक उद्धरणों के अनुसार केरल, कन्याकुमारी व रामेश्वरम की संस्थापना भगवान परशुराम ने ही की थी. जिस स्थान पर उन्होंने तपस्या की थी, वह स्थान आज तिरुवनंतपुरम के नाम से प्रसिद्ध है. केरल में आज भी पुरोहित वर्ग संकल्प मंत्र में परशुराम क्षेत्र का उच्चारण कर उक्त समूचे क्षेत्र को परशुराम की धरती की मान्यता देते हैं. गोमांतक (गोवा) को भी परशुरामजी का कार्य क्षेत्र कहा जाता है. ब्राह्मण की परंपरा के अनुसार परशुराम बिहार के तिरहुत से दस परिवारों को लेकर आए और उन्हें आधुनिक गोवा के नाम से मशहूर गोकर्ण में बसाया था.

हिमालय में फूलों की घाटी मुनस्यारी को बसाने का श्रेय भी परशुराम जी को ही जाता है. यही नहीं, हिंदू धर्म में अत्यंत पवित्र और शुभ मानी जाने वाली कांवड़ यात्रा का शुभारंभ परशुरामजी ने सबसे पहले शिवजी को कांवड़ से जल चढ़ाकर किया था. गौरतलब हो कि “अंत्योदय” की बुनियाद भी परशुरामजी ने ही डाली थी. समाज सुधार और समाज के शोषित-पीड़ित वर्ग को कृषिकर्म से जोड़कर उन्हें स्वावलंबन का पाठ पढ़ाने में भी परशुराम की महती भूमिका रही है. अपने पितामह महर्षि ऋचीक के कहने पर उन्होंने केरल, कोंकण मालाबार और कच्छ क्षेत्र में समुद्र में डूबी ऐसी भूमि को बाहर निकाला जो खेती योग्य थी.

इस तरह भगवान परशुराम लाखो करोडो लोगो के जीविकोपार्जन के कारक बने. विप्र समागम में सारण के विभिन्न प्रखंड से विप्र बंधु उपस्थित हुए. सभा को पंडित अरुण पुरोहित, पंडित अंजनी कुमार मिश्र, पंडित संजय पाठक, पंडित ध्रुव कुमार मिश्र, पंडित घनश्याम मिश्र, पंडित नारायण पांडेय, पंडित मनजीत तिवारी, पंडित विजय मिश्र, पंडित विवेक विभूषित सहित कई गणमान्य लोगो ने संबोधित किया. धन्यवाद ज्ञापन पंडित अरुण पुरोहित ने किया.

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